INTERVIEW: ‘‘मैं इसलिए काम करता हूं ताकि बहुत से लोगों के चेहरों पर मुस्कान ला सकूं’’ : शाहरुख खान  

फिल्म ‘डियर ज़िंदगी’ में जब 40 मिनट बाद इस सुपर स्टार की एंट्री होती है तो दर्शक समझ सकते हैं कि उन्हें अब कुछ अलग देखने को मिलेगा। 70 से ज्यादा फिल्में करने के बाद और बहुत से प्रशंसकों के प्यार के साथ शाहरुख खान आज भी प्रयोग करने में विश्वास रखते हैं। ज़ी सिनेमा पर रविवार 23 अप्रैल को दोपहर 12 बजे ‘डियर ज़िंदगी’ के वर्ल्ड टेलीविजन प्रीमियर के अवसर पर शाहरुख खान ने अपने रोल, अपने स्टारडम और अपनी ज़िंदगी से जुड़े कई पहलुओं पर दिल खोलकर चर्चा की।

दुनिया थेरेपिस्ट को एक ऐसे इंसान के रूप में जानती थी जो सख्त भाषा में बात करता है, पर जहांगीर उसे उस दायरे से बाहर लेकर आया। इस किरदार के बारे में आपकी क्या राय है?

जहांगीर के किरदार के बारे में मैंने ज्यादा नहीं सोचा था। मैंने बस इतना सोचा था कि उसको भी वही समस्या होनी चाहिए जो उसके मरीजों को होती है। मुझे लगता है कि ज़िंदगी में कभी न कभी हरेक के साथ प्यार, रिश्तों और खुद के बारे में दूसरे की भावनाओं को लेकर कुछ समस्याएं जरूर होती हैं। मैं जहांगीर को ज्ञान देने वाला किरदार नहीं बनाना चाहता था, जो लोगों को यह सिखाए कि ज़िंदगी कैसे जीना है। वह सिर्फ अपनी ज़िंदगी के अनुभव बांटता है और किसी का पक्ष लेने को नहीं कहता। कौसर और गौरी ने कहानी कुछ ऐसी लिखी है कि आप देखेंगे कि उसकी बातों का कोई अंत नहीं है। वह खुली बातें करता है। इस कहानी में मरीज कायरा से यह नहीं कहा जाता है कि वह यह करे और यह न करे। मैं जहांगीर खान का यही पहलू इस किरदार में लाना चाहता था।

फराह खान के बाद गौरी शिंदे दूसरी महिला निर्देशक हैं जिनके साथ आपने काम किया। एक एक्टर के रूप में आपको इन दोनों निर्देशकों ने किस तरह हैंडल किया?

बहुत अच्छी तरह! मुझे दोनों ही लेडी डायरेक्टर्स के साथ काम करके बहुत मजा आया। एक ही दृश्य के लिए दोनों की सोच अलग-अलग है। मैं खुद एक पुरुष हूं और इसलिए एक औरत की तरह किसी दृश्य को समझ पाना जरा मुश्किल है। लेकिन हर सीन, हर लाइन को लेकर दोनों की संवेदनशीलता अलग है, चाहे वह कॉमिक सीन हो या इमोशनल। एक एक्टर के रूप में इससे मुझे नया आयाम मिलता है। मैं एक औरत की तरह नहीं सोच पाता, ना ही उनकी तरह महसूस कर पाता हूं, लेकिन यह कहना चाहूंगा कि दोनों के काम का तरीका बिल्कुल जुदा है। फराह एक कमर्शियल और खुशमिजाज डायरेक्टर हैं जो आम दर्शकों के लिहाज से फिल्में बनाना चाहती हैं। उनकी स्क्रिप्ट भव्य और परफॉर्मेंस आधारित होती हैं जबकि गौरी वास्तविक, ज्वलंत और गहरी सोच रखने वाली डायरेक्टर हैं। महिलाओं के रूप में दोनों बेहद विनम्र और संवेदनशील हैं लेकिन फिल्मकारों के रूप में दोनों पूरी तरह अलग हैं। मुझे दो अलग-अलग तरह के काम करने की खुशी है। मेरा मानना है कि महिलाएं ज्यादा विवेकशील और मेहनती होती हैं इसलिए उनके साथ काम करने से मेरे लिए आसानी हो जाती है।

समुंदर से कबड्डी, चरमराती कुर्सियां, रिपेयर और रिसाइकिल – इनमें से आप अपने बच्चों को कौन सी खूबी सिखाना चाहेंगे?

चरमराती कुर्सियां तो बिल्कुल भी नहीं सिखाना चाहूंगा। यदि आप वाकई किसी से प्यार करते हैं तो इसे खुद तक रखने की बजाय उन्हें बता देना चाहिए। मुझे समुंदर से कबड्डी का कॉन्सेप्ट काफी पसंद आया। इसमें जीत वाली कोई बात नहीं होती और न ही इसका कोई अंत होता है। बस आपके भीतर एक प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा होती है, फिर वह चाहे खेलों में हो या असल ज़िंदगी में, और यही इसकी खूबी है। आप कुछ ऐसा रोकना चाहते हैं जो आपको पता है कि आप नहीं रोक सकते, लेकिन आप हार नहीं मानते। आप बस खेल का मजा लेते हैं। मेरा यकीन इसी विचार में है कि आप जीत के लिए खेलें लेकिन खेल का मजा लेना भी जरूरी है। क्योंकि जीत और हार तो खेल और ज़िंदगी दोनों में ही शामिल हैं और इसे आपको स्वीकार करना चाहिए। यह सिर्फ अपनी ज़िंदगी का मजा लेने के बारे में है और समुंदर से कबड्डी में भी यही सारे विचार हैं।

आपने एक लवर बॉय, एक एनआरआई, एक सुपर हीरो, एक गैंगस्टर, एक हॉकी कोच, एक फैन और एक थेरेपिस्ट की भूमिकाएं निभाई हैं? क्या इन सभी का कुछ न कुछ शाहरुख खान में है या फिर इन सभी किरदारों में कुछ-कुछ शाहरुख हैं?

सच कहूं तो एक एक्टर जो भी किरदार निभाता है वह उसका हिस्सा बनने से बच नहीं सकता। यह पूरी तरह जरूरी है। यह आपकी ज़िंदगी का अनुभव है कि आप इसे कैसे अभिव्यक्त करते हैं, भले ही यह किसी और की कहानी और पटकथा क्यों न हो। एक एक्टर के रूप में मैंने हमेशा यही माना है कि मैं सिर्फ एक इंसान को सबसे अच्छी तरह से जानता हूं और वह इंसान मैं खुद हूं। रही बात मेथड एक्टिंग, रिसर्च और रोल की तैयारियों की, तो मैं खुद को एक फैन या एक कोच की जगह रखकर देखता हूं। एक बार जब मैं उस किरदार की कला सीख गया तो बहुत से किरदारों को मैं निभाने लगता हैं न कि मुझे किरदार निभाते हैं। जैसे यदि मैं कोच की भूमिका में हूं तो एक कोच को हॉकी खेलना आना चाहिए या फिर दिल्ली के इंदर विहार में रहने वाले एक मिडिल क्लास फैन की बोली और हाव-भाव एक खास तरह के होने चाहिए। यह भले ही एक्टिंग सीख रहे लोगों के लिए सही सलाह नहीं होगी लेकिन मैं सहज रूप से इन्हीं परिस्थितियों में बड़ा हुआ हूं और मैंने इसे अपनी खूबी बना लिया है।

शाहरुख खान की ज़िंदगी का एक परफेक्ट दिन कैसा होगा?

एक फुर्सत भरे दिन में बच्चों के साथ समय बिताना। यदि मैं अपनी बेटी के साथ हूं तो प्रिटी लिटिल लायर्स या फिर इसी तरह की कोई फिल्म देखना। यदि मैं बेटे के साथ बैठा हूं तो डोरेमॉन देखना और यदि मैं अपने बड़े बेटे के साथ हूं तो कोरिया की कोई रहस्यमयी फिल्म देखना जो मुझे समझ में नहीं आती लेकिन मेरे बेटे को समझती है। इसलिए बच्चों साथ फिल्में देखना, आलू चिप्स और कोला का मजा लेना, शॉर्ट पहनकर बेड पर पूरी तरह अस्त-व्यस्त हालत में रहना ही मेरे लिए एक परफेक्ट दिन है।

दुनिया भर में 3 अरब से ज्यादा लोग शाहरुख खान को देखते हैं। इस कड़ी मेहनत के लिए आपको कहां से प्रेरणा मिलती है?

मुझे संख्या का तो पता नहीं लेकिन मुझे यह जरूर पता है कि बहुत से लोग मेरी फिल्में देखते हैं। मैं बहुत-सी जगहों पर जाता हूं जहां मुझे पता चलता है कि वे बचपन से मेरी फिल्में देख रहे हैं। इसलिए उनका मनोरंजन करना मेरी जिम्मेदारी है और यदि उनका मनोरंजन पहले से हो रहा हो, तो मैं उन्हें इस बात के लिए शुक्रिया अदा करता हूं कि वे इतने वर्षों से मुझे एक एक्टर, एक स्टार, एक फिल्म प्रोड्यूसर और एक इंसान के रूप में पसंद कर रहे हैं। मैं सिर्फ यह सुनिश्चित करना चाहता हूं कि वे इस बात से खुशी महसूस करें कि उन्होंने मेरी फिल्में देखने या एक इंसान के रूप में मुझे पसंद करने का चुनाव किया है। यह बहुत मेहनत का काम नहीं है और न ही यह किसी तरह की जिम्मेदारी है। यह सिर्फ ऐसा कहने जैसा है कि मुझे आप पसंद करते हैं और मैं भी आपको पसंद करता हूं। और जब आप किसी को चाहते हैं तो आपको अपनी तरफ से कुछ प्रयास करने होते हैं लेकिन मैं इसे बड़ी सहजता से लेता हूं। मैं बस सुबह उठता हूं, फिल्म की शूटिंग पर जाता हूं और कुछ ऐसा काम करता हूं जिससे लोगों के चेहरों पर मुस्कान खिल उठे। मैं हमेशा कहता हूं कि मैं इसलिए काम करता हूं ताकि बहुत से लोगों के चेहरों पर मुस्कान ला सकूं।

‘डियर ज़िंदगी’ में देखिए ज़िंदगी को दोबारा खोजने की एक सादगी भरी कहानी, रविवार 23 अप्रैल को दोपहर 12 बजे ज़ी सिनेमा पर!

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