INTERVIEW: ‘‘फिल्म ‘बैंक चोर’ में महाराष्ट्रीयन युवक बना हूॅँ..’’ – रितेश देशमुख

2003 में फिल्म ‘तुझे मेरी कसम’ से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखने वाले रितेश देशमुख ने 14 साल के अभिनय करियर में कई नई उंचाइयां छू ली हैं। यूँ तो वह कुछ फिल्मों में रोमांटिक या ग्रे किरदार में भी नजर आए हैं, मगर ज्यादातर फिल्मों में वह कॉमेडी करते हुए नजर आते रहे हैं। फिलहाल वह अपनी नई फिल्म ‘बैंक चोर’ को लेकर काफी उत्साहित हैं, इसमें भी ह्यूमर है।

गत वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘बैंजो’ की असफलता की वजह क्या रही?

यह वजह हो सकती है कि ‘बैंजो’ वाद्ययंत्र से मुंबई के बाहर के लोग परिचित नहीं है। या हम कहानी के स्तर पर रोचकता नहीं पैदा कर पाए जो दर्शक फिल्म में देखना चाहते थे।

आपने कई हास्य फिल्में की हैं। उनसे ‘बैंक चोर’ अलग किस तरह है?

‘हाउसफुल’ या ‘धमाल’ यह सब स्लैपस्टिक कॉमेडी वाली फिल्में हैं। इनमें हम ओवर टॉप जाकर कॉमेडी करते हैं। पर ‘बैंक चोर’ ऐसी फिल्म है, जिसमें सिच्युएशन की वजह से यानी कि परिस्थितिजन्य तनाव के चलते जो ह्यूमर आता है, वह ह्यूमर या कॉमेडी है। ‘बैंक चोर’ की कहानी के अनुसार तीन बेवकूफ किस्म के चोर बैंक के अंदर चोरी करने के लिए घुस जाते हैं। पर उन्हें बैंक लॉकर ही नहीं मिलता। उनके हाथ से गलत बटन दब जाता है, जिसके चलते बैंक के बाहर पुलिस पहुॅच जाती है, पुलिस के बाद मीडिया भी पहुॅच जाती है। इस सिच्युएशन में इनके साथ क्या होता है, यह किस तरह के तनाव में आते हैं और उससे जो ह्यूमर पैदा होता है, वह लोगों के चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान लाएगा। इसी के पैरल राजनेता आ जाते हैं। यानी कि इन मूर्ख किस्म के बैंक चोरां की वजह से दूसरों की कलई खुलने वाली है। इसका तनाव अलग है। अब क्या ह्यूमर निकलता है,वह देखने लायक है। मध्यमवर्गीय परिवार के रहन सहन वाला ह्यूमर है। यह षारीरिक हास्य का मसला नहीं है। बल्कि दिमागी ज्यादा है।

किस तरह की कॉमेडी में आप खुद को ज्यादा सहज पाते हैं?

मेहनत तो हर तरह की कॉमेडी करने में होती है। जितनी मेहनत केले के छिलके पर पैर रखकर फिसलने में होती है, उतनी ही मेहनत सिर्फ आँखां से इषारे करने में भी होती है। क्योंकि संजीदगी तो उतनी ही होती है।

आप अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

मैंने इसमें एक महाराष्ट्रीयन युवक चंपक चिपुलुनकर का किरदार निभाया है। उसकी अपनी जिंदगी की कुछ बड़ी समस्या है, जिसके चलते वह बैंक लूटने के लिए आता है। वह अपने साथ दो उत्तर भारतीय युवकों को भी लेता ह।यानी कि एक मराठी और दो हिंदी भाषी लोग एक साथ किसी काम को अंजाम देने जाते हैं।

 कपिल शर्मा के मना करने के बाद आपको ‘बैंक चोर’ ऑफर की गयी थी, तो आप में  हिचक नहीं थी?

मैं इस तरह से नहीं देखता या सोचता।

आप ज्यादातर कॉमेडी फिल्मों में ही नजर आते हैं?

2003 में रोमांटिक फिल्म ‘तुझे मेरी कसम’ से जब मैंने करियर शुरू किया था, तब मैंने नहीं सोचा था कि मैं इतनी कॉमेडी फिल्में करुंगा। लेकिन मुझे ऑफर मिलते रहे, मुझे पटकथा व किरदार पसंद आते रहे और मैं वह फिल्म करता चला गया। एक फिल्म हिट हुई, तो उसकी सीरीज भी बनी। वैसे आज से दस वर्ष पहले आज की तरह हमारे सामने चुनने के लिए बहुत ज्यादा विकल्प भी नहीं होते थे। अब तो कई तरह की फिल्में बनने लगी हैं।

किसी फिल्म का निर्माण या उसमें अभिनय करने का निर्णय कैसे लेते हैं?

पहली बात तो मैं अपने आपको दोहराने में यकीन नहीं रखता। दूसरी बात फिल्म का निर्माण करना हो या किसी फिल्म में अभिनय करना हो, इसका निर्णय तो कहानी व स्क्रिप्ट के आधार पर ही करता हूं। कहानी दिल को छूने वाली होनी चाहिए। फिल्म की कहानी सुनने के बाद मैं सबसे पहले अपने आपसे सवाल करता हूं कि क्या लोग इस कहानी को सुनना पसंद करेंगे? फिर सवाल करता हूं कि क्या मैं खुद इस कहानी को सिनेमा के पर्दे पर देखना चाहूंगा? उसके बाद स्क्रीन प्ले पर गौर करता हूं कि जो कहानी है, क्या वह सही ढंग से कही जा रही है या नहीं। उसके बाद ‘गट्स’ फीलिंग के साथ फिल्म को बनाते हैं।

आप खेलों से नहीं जुड़े..जबकि कुछ कलाकार खेल की टीमें चला रहे हैं?

यह उनका पैशन है, इसलिए वह जुड़े हैं। पर मैं अभिषेक की कबड्डी या आई पीएल को सपोर्ट करता रहता हूं। मैं मैच भी देखता हूँ।

आपको किस तरह की फिल्में देखना पसंद है?

डार्क ह्यूमर वाली फिल्में देखना पसंद है।

‘एक विलेन’ में आपके अभिनय की काफी प्रशंसा हुई थी। ग्रे किरदार था? उस तरह की फिल्में नहीं कर रहे हैं?

यदि मुझे ऑफर मिलेंगे, तो मैं करना पसंद करुंगा। मैं तो हॉरर फिल्में भी करना चाहता हूं।

इसके बाद क्या…?

मराठी फिल्म ‘फास्टर फेनी’ का निर्माण किया है। इसमें अभिनय भी किया है। इन दिनों छत्रपति शिवाजी पर फिल्म की तैयारी कर रहा हूं। पटकथा तैयार हो गयी है। इसमें शिवाजी का किरदार भी निभानेवाला हूँ।