मूवी रिव्यू: अलग विषय को लेकर खास है ‘फुल्लू’

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आज नये मेकर ऐसे विषयों पर फिल्में बनाने की हिम्मत दिखा रहे हैं जिनके बारे में कल तक सोचा तक नहीं जा सकता था। इस सप्ताह निर्देशक अभिषेक सक्सेना की फिल्म ‘फुल्लू’ एक ऐसे ही विषय  पर आधरित है।

फुल्लू यानि शारीब हाश्मी गांव का ऐसा मस्त मौला युवक है जो गांव की तमाम ओरतों की जाति इस्तेमाल करने वाली चीजों को शहर से लाकर उनकी मदद करता रहता है,जबकि उसकी मां सूर्या नूतन  गुदड़ी बनाने और बेचने का काम करती है। जिसके लिये कतरनें फुल्लू शहर से  लाकर उसकी मदद करता है । लेकिन चूंकि  वो एक जवान बहन का भाई भी है इसलिये वो अपने बेटे को कहती रहती है कि वो गांव के फालतू काम छौड़ शहर जाकर कोई नौकरी धंधा कर दो पैसे कमाये, जिससे उसकी जवान बहन का विवाह हो सके,लेकिन फुल्लू जब नही मानता तो किसी के कहने पर उसकी शादी ज्योति सेठी से कर दी जाती है ।अपनी पत्नि के जरिये फुल्लू को ओरतों के पीरियड्स के बारे में पता चलता है कि आज भी गांव की ओरतें पीरियड्स के दौरान कपड़ों का प्रयोग करते हुये इन्फेक्शन का शिकर हो जाती हैं । इसके अलावा उसे गांव की टीचर और शहर की डॉक्टर से भी इस विषय में ढेर सारी जानकारी मिलती है, जिसके चलते  वो जो पहला पैड बनाता है उसे सबसे पहले अपनी बहन को देता है । इस पर उसे बेशर्म कहते हुये उसकी मां उसकी जमकर पिटाई कर देती है । फुल्लू को धुन लगी है कि वह किस प्रकार सही पैड बनाये और गांव की ओरतों को इन्फेक्शन से बचाये । बाद में इसके लिये वो शहर जाता है और वहां तमाम मुश्किलों और दुश्वारियों के बाकायदा पैड बनाना सीखता है और फिर गांव आकर पैड बनाने की जुगत में लग जाता है । लेकिन इस काम में उसकी पत्नि के अलावा उसकी मां, बहन और सारे गांव की ओरतें उसके खिलाफ हो जाती हैं।

निर्देशक ने बेशक विषय नया और बढि़या चुना लेकिन वे उसे सही मकाम तक नहीं पहुंचा पाये। उसकी कई वजह रहीं ।जैसे एक तो कहानी मध्यांतर तक रजिस्टर्ड ही नहीं हो पाती यानि अपने असली मकसद तक नहीं पहुंच पाती, दूसरे कितना ही वक्त फुल्लू को मस्तमौला और मासूम दिखाने में जाया कर दिया । जिसके चलते दर्शक फिल्म में असली मकसद का इंतजार करता रहता है । इसके बाद फुल्लू और उसकी पत्नि के बीच प्यार मौंहब्बत दिखाने में काफी वक्त निकाल दिया ।  लिहाजा जब तक फिल्म मेन मुद्दे पर आती है तब तक काफी देर हो जाती है । फिल्म  का बेस चूंकि गांव है और गांव दिखाने में निर्देशक का अच्छा योगदान रहा लेकिन कई लेडीज किरदारों के लुक पर ध्यान नहीं दिया गया क्योंकि वे पूरी तरह से शहरी लगती हैं यहां तक फुल्लू की बहन भी । खैर कुछ भी हो, महावारी जैसे गुप्त मुद्दे को फिल्म में भली भांती उजागर किया गया है।

अभिनय की बात की जाये तो शारीब  अपनी पहली फिल्म में ही बता चुका है कि वो एक बेहतरीन अभिनेता है । इस बार भी उसने एक  मस्त मौला और मासूम किरदार को पूरी शाईस्तगी से निभाया है । उसकी मां की भूमिका में सूर्या ज्योति ने सहज अभिनय किया है ।ज्योति सेठी का काम भी सराहनीय रहा । स्पेशल रोल में अचानक प्रकट हो इनामुलहक अपने  उम्दा अभिनय से दर्शकों का भौंच्चका कर जाते हैं।

बेशक फिल्म अपनी बात पूरी तरह से नहीं कह पाती । लेकिन अलग विषय को लेकर फिल्म  देखी जा सकती है।

 

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