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मूवी रिव्यू: रियलस्टिक अप्रोच और बढ़िया अभिनय ‘जॉली एलएल बी 2’

बॉकस ऑफिसबॉक्स ऑफिसबॉलीवुड अपडेटसश्याम शर्मा

रेटिंग***

सुभाष कपूर की फिल्म ‘जॉली एलएल बी 2’ एक ऐसी फिल्म थी जो वास्तविकता के करीब संवेदनशील सवाल उठाती फुल मनोरजंक फिल्म थी। उस फिल्म में अरशद वारसी ने शानदार काम किया था। अब सुभाष कपूर  ‘जॉली एलएल बी 2’ को लेकर आये है। फिल्म अपने पुराने फ्लेवर के साथ है लेकिन कुछ बदलाव,फिल्म में नयापन और उसे फ्रेश बनाते हैं।aksha

अक्षय कुमार यानि जगदीश्वर मिश्रा उर्फ ‘जॉली एलएल बी 2’ लखनऊ में उसी वकील के यहां काम करता है जहां उसके पिता ने करीब तीस वर्ष मुंशीगिरी की थी लिहाजा उसकी स्थिति भी मुंशी गिरी से कुछ ज्यादा अलग नहीं है। जॉली वहां नौकरी करने के अलावा ढेर सारे उल्टे सीधे काम करके अलग से पैसा बना लेता है। अपने काम के अलावा जॉली को  पता नहीं क्यों अपनी पत्नि पुष्पा यानि हुमा कुरेषी का भी सारा काम करना होता है जैसे वो उसके लिये पैग बनाता है खाना बनाता है वगैरह वगैरह। जॉली का सपना है कि उसका अपना चैंबर हो। एक दिन वो अपना सपना पूरा करने में सफल भी हो जाता है लेकिन उसका सपना पूरा होता है एक ऐसी न्याय मांगती महिला सयानी गुप्ता की लाश पर, जिसे जॉली ने धोखा दे अपना सपना पूरा किया। सयानी द्धारा आत्महत्या करने के बाद  जॉली को भारी पष्चाताप होता है लिहाजा वो उस मरी हुई औरत को इंसाफ दिलाने का फैसला कर लेता है, जिसके लिये उसे शहर के सबसे बड़े वकील अनु कपूर और पूरे सिस्टम का सामना करना पड़ता है। ढेर सारी दिक्कतों और दुश्वारियों के बाद जॉली जीत हासिल करता है।jolly llb 2

सुभाष कपूर ने फिल्म का बेस वही रखा है जो उनकी पहली फिल्म में था यानि वही फटेहाल फटीचर वकील जॉली, उसकी वही दुश्वारियां, फिर अपने द्धारा किये कुकृत्य के बाद पश्चाताप स्वरूप अपने क्लांइट को न्याय दिलाने के लिये पूरे सिस्टम से भिड़ जाना। पहले इस रोल में अरशद वारसी थे और दूसरे भाग में अक्षय कुमार। लेकिन सुभाष दोनों से ही सर्वश्रेष्ठ अभिनय करवाने में पूरी तरह सफल रहे। फिर भी अरशद  यहां एक पायदान ऊपर है क्योंकि भूमिका का ढांचा उन्होंने ही खड़ा किया था, अक्षय ने उसे सफलता पूर्वक फॉलो किया है। आप कह सकते हैं कि जंहा पहली फिल्म में अरशद अपने रंग में थे वहीं इसके दूसरे भाग में अक्षय भी अपने पूरे शबाब पर दिखाई दिये। निर्देशक ने पहले की तरह यहां भी फिल्म की वास्तविकता को बरकरार रखा। रियलस्टिक होने के बावजूद फिल्म मनोरजंक है। फिल्म में लखनऊ का माहौल, बोलचाल यानि हर बात का ध्यान रखा है । कथा पटकथा और संवाद  सभी कुछ प्रभावशाली है लेकिन निर्देशक अक्षय और हुमा के दामपत्य संबन्धों को रजिस्टर्ड नहीं कर पाते ।akshay kumar

कॉमिक और इमोशन उभारने में अक्षय का जवाब नहीं। यहां जॉली की भूमिका में वे अपनी भावभंगिमाओं से हंसाते हैं तो इमोशन के तहत रूलाते भी हैं। लखनऊ में प्रैक्टिस करते हुये वे अपने कानपुरिया होने का एहसास भी करवाते रहते हैं। हुमा कुरैशी के पूरी फिल्म में मुश्किल से चार या पांच सीन्स होगें। फिल्म में अगर उनकी भूमिका नहीं भी होती तो भी कहानी पर इसका जरा भी प्रभाव नहीं पड़ता ।  जज के रोल मे सौरभ शुक्ला जॉली के बाद जॉली 2 में पहले कहीं ज्यादा फार्म में दिखायी दिये। अनु कपूर भी बड़े वकील के रोल में जमे हैं। इनके अलावा कुमुद मिश्रा,मानव कौल, सयामी गुप्ता तथा निखिल द्विवेदी ने भी अपनी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है ।

फिल्म में ज्यादा गीत नहीं है लेकिन जितने भी हैं कैची हैं खास कर होली का गीत काफी दिनों बाद किसी फिल्म में दिखाई दिया है।

रियस्टिक अप्रोच और अक्षय के ऑलराउंडर अभिनय के लिये फिल्म का हिट होना वक्त की बात है।

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