मूवी रिव्यू: दर्शक जुटाने में नाकायाब ‘एक हसीना थी एक दीवाना था’

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रेटिंग*

साढ़े चार सो फिल्मों का वितरण तथा एक दर्जन से ज्यादा फिल्मों का निर्माण और निर्देशन करने वाले अनुभवी फिल्म मेकर सुनील दर्शन जब ‘एक हसीना थी एक दीवाना था’ जैसी बचकानी फिल्म बनाते हैं तो घौर आश्चर्य होता है। कहानी में सुपर नैचुरल का बासी तड़का और अजीब अजीब से मौड़ दर्शकों में दिलचस्पी की जगह खीज पैदा करते हैं ।

लंदन में एक आलीशान स्टेट में नताशा फर्नांडीज और उपेन पटेल शादी के लिये आते हैं,बीच में उनके साथ कुछ ऐसे हादसे पेश आते हैं जो किसी सुपर नैचुरल होने की तरफ इशारा करते हैं । अंत में वे इन सब से किस प्रकार निजात पाते हैं ।

इससे पहले सुनील दर्शन अपने बेटे शिव दर्शन को फिल्म‘ कर ले प्यार कर ले’ से लांच कर चुके हैं लेकिन  फिल्म न चलने की बदौलत उन्होंने इस फिल्म के साथ एक बार फिर कोशिश की, लेकिन इस बार की कोशिश इतनी लचर और बचकानी साबित हुई जो कैसे भी हजम नहीं होती । कमजोर स्क्रिप्ट, अति साधारण संवाद, बचकाने दृश्य फिल्म को और ज्यादा हास्याप्रद बनाते हैं । इस फिल्म से म्युजिक कंपोजर नदीम ने वापसी की है उन्होंने काफी मलौडियस म्युजिक दिया है लेकिन वो आज का नहीं बल्कि कल म्युजिक  है । फिल्म का उजला पक्ष है खूबसूरत लोकेशसं  तथा गीतों का बढि़या नयनाभिराम फिल्माकंन ।

अगर शिव दर्शन की बात की जाये तो सबसे पहले तो उसका नाम ऐसा लगता है जैसे किसी बिल्डिंग का नाम हो, दूसरे अपनी लांचिंग फिल्म में वो कहीं ज्यादा बेहतर लगा था लेकिन इस बार उसका जितना कंफ्यूज किरदार है उससे कहीं ज्यादा कंफ्यूज उसने एक्टिंग की है । नताशा फर्नांडीज खूबसूरत है लेकिन उसे आगे संवाद अदाईगी के लिये मेहनत करनी पड़ेगी । उपेन पटेल को देखकर हैरानी होती है क्योंकि इस बार वो उम्मीद से कहीं ज्यादा मच्यौर अदाकार दिखाई दिया, जंहा उसकी अदाकारी में ठहराव दिखाई दिया, वहीं वो पहले से कहीं ज्यादा साफ हिन्दी बोलता दिखाई दिया । लिहाजा एक्टर के तौर पर वहीं  इकलौता किरदार है जो दर्शकों को राहत देता है । इसके अलावा जंहा एक अरसे बाद ललित तिवारी दिखाई दिये (हालांकि उनकक किरदार अंत तक  परिचय नहीं दिया गया )वहीं, एन आर आई  थियेटर एक्टर कृषन टंडन महज एक सीन में ही प्रभावित कर जाते हैं ।

अंत में यही कहा जाता है कि फिल्म शायद ही दर्शक जुटा पाये ।

 

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