INTERVIEW: ‘ऐसा लगता है लाइफ फुल सर्किल आ चुकी है -जूही चावला

लिपिका वर्मा

जूही चावला की डेब्यू हिंदी फिल्म ‘कयामत से कयामत’ थी। किन्तु इससे पहले वह कन्नड़ फिल्म कर के कैमरे के सामने की झिझक बिल्कुल मिटा चुकी थी। उनके लिए, आमिर उनके सामने एक न्यू  कमर की तरह थे। जूही ने फिल्मों से स्पोर्ट्स के मैदान तक का सफर तय कर  लिया है, किन्तु आज वह आम जनता के लिए भी हेल्थ से जुड़े कई प्लेटफॉर्मस पर लेक्चर्स देकर जीवन को किस तरह सुखमय बना सकते है, यही सब भी करने में अपना बहुमूल्य समय व्यतीत किया करती है। हाल ही में, ‘दादा साहब फाल्के अवॉर्ड्स’ से भी नवाजी गयी जूही अपनी हालिया रिलीज ‘चाक एंड डस्टर’ फिल्म के लिए। कुछ फिल्में भी कर रही है उन्हें अपने बिजी समय से फिल्मों के लिए भी समय निकालना बहुत कठिन हो रहा है।

जूही ने लिपिका वर्मा  से ढेर सारी बातचीत की और अनेक सवालों का जवाब भी दिया-पेश है  बातचीत के कुछ अंश –

जूही का पहला डेब्यू अवॉर्ड से लेकर पहली फिल्म की यादें -दरअसल में इस समय मुझे पहले  अवॉर्ड के बारे में ज्यादा कुछ याद नहीं आ रहा है। बस इतना याद है कि- उन दिनों ‘लक्स फिल्मफेयर’ अवॉर्ड, मेरी पहली हिंदी फिल्म ‘कयामत से कयामत’ के लिए ही  किसी एक श्रेणी में मुझे दिया गया था। यह भी मुझे इस लिए याद रह गया क्योंकि ठीक  उसी दिन मैंने एक बंगला फिल्म ‘अमोर प्रेम’ प्रोसेनजीत के अपोजिट साईन भी की थी। मुझे ऐसा लगता है कि -मेरा बंगाल से  कोई आत्मीय  कनेक्शंस है। देखिये न, पहली बंगला फिल्म के बाद मैंने ‘कोलकत्ता नाईट राइडर्स’ की टीम के लिए बंगाल ही चुना।

कयामत से कयामत की कुछ यादें हम से शेयर कीजिये – क्या सुनना चाहेंगे ..चलिए मैं आपको शूटिंग सेट्स पर लिये  चलती हूँ। दरअसल में, यह फिल्म ऊटी  में जब हम शूट करने गए तो मुझे तो यह एक पिकनिक की तरह ही लगा। आमिर खान पहले फिल्मों में बतौर असिस्टेंट काम  कर चुके थे। किन्तु उनके लिए कैमरा फेस करना नया था। बतौर अभिनेता  यह इनकी पहली फिल्म थी। जब कि मैं पहले एक कन्नड़ फिल्म कर चुकी  थी। और क्योंकि साउथ में लोग बहुत रगड़ के काम लेते हैं तो मैं अब तक बहुत मंझ चुकी थी। जब हम अपनी पहले दिन की शूटिंग चांदीवली में कर रहे थे तो मैं सब कुछ जल्दी कर लिया करती। यहाँ तक की कैमरे के सामने आराम से बेझिझक अपना शॉट भी  दे दिया करती। जब कि आमिर खान कैमरे के सामने कम्फर्टेबल नहीं थे और उनके कई रिटैक्स हो जाया करते। मुझे बड़ा मजा आता कि  मैं अच्छा काम कर रही हूँ।

कुछ सोच कर जूही आगे बोली, ‘‘जब हम लोग ऊटी में एक गाने की शूट कर रहे थे तो निर्देशक मंसूर जी और कैमरामैन एवं मेकअप दादा और हेयर ड्रेसर से लेकर कुछ अन्य टेक्निशन्स पुराने थे। सो वह हमारी एक्टिंग को देख कर ’’, पता नहीं यह लड़का और लड़की क्या कर रहे है ?? फिल्म का क्या हश्र  होगा? यह सब बातें सेट पर किया करते।—किन्तु हम इस बात से अनजान थे। किन्तु जब ‘कयामत से कयामत’ को बॉक्स ऑफिस पर बम्पर सफलता मिली तो सब हैरान हो गए। फिल्म को ढेर सारे अवॉर्ड्स  भी मिल गए। यहां से हमारा हिंदी फिल्म का सफर सफलतापूर्ण शुरू हुआ।

अवॉर्ड्स को लेकर जूही का क्या कहना है – जी  हाँ इस साल जब मुझे, ‘दादा साहब फाल्के अकादमी’ अवॉर्ड सम्मानित किया गया तो खुशी मिली सिर्फ इसलिए क्योंकि यह अवॉर्ड मुझे जेनुइनेली सही मायने, में खुद से दिया गया। मैंने किसी तरह से रैली नहीं किया था  अवार्ड के लिए, मेरी फिल्म ‘चाक एंड डस्टर’  के लिए अवॉर्ड मिला बहुत खुशी मिली मुझे। और इस अवॉर्ड के  मिलने से मैंने  जितने अवॉर्ड्स मेरे घर में रखे  है उन्हें साफ करवाया , चमकाया और सुन्दर तरीके से शेल्फ पर सजा कर रख दिया। यह सब करने से मुझे खुशी भी मिली।

शाहरुख खान से दोस्ती के बारे  में- आजकल मेरी शाहरुख से साल में  दो बारी ही मुलाकात हो पाती है। वो भी ‘के के आर’ से संबंधित काम के सिलसिले में। सच्चाई  तो यह है कि वह फिल्मों में बिजी रहते हैं और मैं ज्यादा फिल्में नहीं कर रही हूँ सो अधिक मिलना नहीं हो पाता है। पर हाँ हमारी दोस्ती फिल्मों से लेकर स्पोर्ट्स ग्राउंड्स तक पहुंच गयी यह सो यह एक बहुत अच्छी बात है। हम दोस्ती को कायम रख पाये हैं। वर्किंग रिलेशनशिप होना इतने लम्बे अर्से तक बहुत ही  खुशी मिलती है।

‘के आर के’ टीम के निर्णय के बारे में -‘के आर के’ के  सी ई ओ, वेंकी एवं जय मेहता और शाहरुख खान ही हर एक टीम से जुड़े हर एक मुद्दे पर निर्णय लेते हैं। मैं तो सिर्फ ‘आई पी एल’ के दौरान ही जगती हूँ हंस कर बोली जूही।

अपना फिल्मी सफर कन्नड़ फिल्म से शुरू किया और अब एक कन्नड़ फिल्म कर रही  जूही कहती है, ‘‘ऐसा लगता है लाइफ फुल सर्किल आ चुकी है। ताजुब की बात है मेरी साउथ की डेब्यू  फिल्म  कन्नड़ से ही हुई  थी और आज फिल्म ‘टेन  ऑन टेन’ जो एक बेहतरीन कन्नड़ फिल्म है। उसके लिए काम पूर्ण किया है। बहुत खुशी मिलती है कि आज यह कन्नड़ फिल्म जो बच्चो और पेरेंट्स की उधेड़ बुन दिखाती  है, इस फिल्म का हिस्सा बन ऐसा लग रहा है जहाँ से शुरू किया आज वही पर आ गयी हूँ। यह भी ईश्वर की ही माया है।’’

जूही के अपने बच्चों। से रिश्ते के बारे में- क्या मुझे देख कर आपको ऐसा महसूस होता है कि मेरा बच्चों  पर अंकुश होगा। उन्हें में कंट्रोल कर पाती होंगी।  हर माँ की तरह मुझे भी यही  चिंता लगी  रहती है। बच्चों ने ठीक से खाना खाय होगा या नहीं? या फिर कही कंप्यूटर पर कोई गेम्स ही खेलने  में तो व्यस्त नहीं  है? या फिर टी वी ही तो नहीं देखते बैठे हैं? लेकिन साथ ही मेरा यह भी मानना है – हमे बच्चों पर ज्यादा अंकुश  नहीं लगाना चाहिए। आप  उनके पीछे पड़े नहीं रह सकते हैं। जब बच्चे छोटे होते हैं तब जरूर हम  उन पर जोर जबरदस्ती कर सकते हैं। लेकिन बड़े हो जाये तो दोस्त की तरह ही रिश्ता रखे तो बेहतर  होता है।

क्या आपके बच्चों में एक्टिंग का कीड़ा  है ? मुझे नहीं लगता। मुझे लगता है वो दोनों बहुत ही शर्मीले किस्म के है। न ही उन्हें ड्रामा या नाच करना ही पसंद है। और तो और उन्होंने मेरी एक भी फिल्म नहीं देखी है। बस इस बारी मेरे बेटे ने ‘चाक एंड डस्टर’ देखी और मुझ से आकर कहा आप का अभिनय अच्छा लगा। यह सुनकर मुझे ताजुब भी लगा। खेर वो दोनों ज्यादा अंग्रेजी फिल्में ही देखते रहते है। अब आगे चलकर अभिनय का शौक जग जाये तो कह नहीं सकती। लेकिन अभी तो वह मुझे अभिनय में रूचि रखते हैं ऐसा कतई नहीं लगता है।