INTERVIEW: ‘‘गोविंदा हमेशा स्टार हीरो रहेंगे..’’ – चंकी पांडे

चंकी पांडे ने बतौर हीरो फिल्मां में अभिनय करियर षुरू किया था।एक वक्त वह था, जब उनकी गिनती सफल हीरों में हुआ करती थी। मगर 1993 में प्रदर्शित फिल्म ‘आंखे’ ने सारे समीकरण बदल दिए। इस सुपर डुपर हिट फिल्म में चंकी पांडे और गोविंदा की जोड़ी थी। इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद गोविंदा सुपर स्टार बन गए। उन्हें एक साथ पच्चीस फिल्में मिल गयीं, जबकि चंकी पांडे को एक भी फिल्म नहीं मिली। काफी समय तक वह घर पर खाली बैठे रहे। आज हालात यह हैं कि चंकी पांडे की गिनती अच्छे चरित्र अभिनेता के रूप में होती है, जबकि गोविंदा की फिल्में देखने के लिए दर्शक तैयार नहीं है। गोविंदा की कुछ समय पहले प्रदर्शित फिल्म ‘आ गया हीरो’ को सिनेमाघर में पांच प्रतिशत दर्शक नहीं मिलें

फिल्म बेगम जानके आपके किरदार कबीर को काफी पसंद किया गया?

मेरे हिसाब से यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। मुझे अपने अंदर की एक अलग तरह की प्रतिभा को दिखाने का मौका मिला। इससे भी बड़ी बात यह है कि फिल्म देखते समय पहचान नही पाए कि यह चंकी पांडे है। जब उन्हें पता चला कि यह चंकी पांडे है, तो उन्हें आष्चर्य हुआ। लोग हमेशा अपनी पहचान ढूंढ़ते रहते हैं।लोग चाहते हैं कि लोग उन्हें पर्दे पर पहचाने, पर मुझे तो बिना पहचान के ही इतनी बड़ी उपलब्धि मिल गयी।

मूल फिल्म के मुकाबले बेगम जानमें आपके किरदार कबीर में कुछ बदलाव किए गए हैं। इसकी वजह?

मैंने मूल बंगला फिल्म ‘राजकहिनी’ देखी नहीं है। इसलिए इस संबंध में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता। पर मुझे जो बताया गया, उसके अनुसार मूल बंगला फिल्म में कबीर पागल हो जाता है। पर ‘बेगम जान’ में नहीं होता। मौलिक फिल्म में तो कबीर का लुक भी अलग है। उसके लंबे बाल रखे गए हैं। इस बदलाव को लेकर मैंने कभी कोई सवाल नहीं किया। मगर ‘बेगम जान’ का कबीर इस बात की ओर इषारा करता है कि अच्छाई तो रहेगी, पर साथ में बुराई भी रहेगी। बुराई का अंत कभी नहीं होगा।

1993 में प्रदर्शित फिल्म आंखेंमें आपके साथ गोविंदा की जोड़ी थी। पर इस फिल्म ने आप दोनों के करियर बदल दिए?

आपने एकदम सही कहा। इस फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर सफल होने के बावजूद मुझे काम नहीं मिला और गोविंदा को 20-25 फिल्में मिल गयी थीं। वह स्टार बन गए थे।

इसी वजह से आप बंगला देश चले गए थे?

ऐसा कह सकते हैं। ‘आंखें’ जैसी सुपर डुपर हिट फिल्म देने के बाद मैं घर पर बैठा था, मुझे फ्रस्ट्रेशन हो रही थी। जो किरदार मिल रहे थे, वह पसंद नहीं आ रहे थे। मैं काम करना चाहता था, पर काम को लेकर समझौता करना नहीं चाहता था। तभी मैंने पार्थो घोष के साथ एक फिल्म की थी,  जिसमें रितुपर्णा सेन घोष, मिथुन वगैरह भी थे। यह 1994 की बात है। उसके बाद उन्होंने मुझे बंगलादेश बुला लिया। वहां की फिल्मों में काम करते हुए मैं  बांग्लादेश का होकर रह गया। उस वक्त बॉलीवुड की तरफ तो मैंने देखा भी नहीं। 1999 तक मैं बंगला देश में स्टार रहा। उसके बाद भारत वापस आ गया था।

तो फिर बंगला फिल्मो को अलविदा कह वापस भारत आने की वजह क्या बनी थी?

1998 में मैंने शादी की। तब मैं हनीमून के लिए अपनी पत्नी को बंगलादेश लेकर गया। यह मेरी मजबूरी थी, क्योंकि बंगलादेश में मेरी शूटिंग चल रही थी। मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि आप यहां बहुत इंज्वॉय कर रहे हैं। अच्छा काम कर रहे हैं। अच्छे पैसे मिल रहें हैं। जबरदस्त शोहरत मिल रही है। पर यहां के लोग आपसे इसलिए प्यार करते हैं, क्योंकि आप बॉलीवुड के स्टार चंकी पांडे हैं। अपनी इस पहचान को खोने ना दें। जल्दी बॉलीवुड में आकर काम करें। इस तरह मेरी पत्नी वापस मुझे बंगलादेश से मुंबई ले आयी। मुंबई आकर मैंने सबसे पहले हैरी बावेजा को फोन किया। उसने मुझसे कहा कि अजय देवगन के साथ एक फिल्म कयामत बना रहे हैं। इसमें एक वैज्ञानिक का छोटा सा किरदार है। मैंने वह कर लिया। उसके बाद चरित्र अभिनेता के तौर पर मैं फिल्में करने लगा। मैंने तय कर लिया कि मैं फिल्मों में छोटे छोटे किरदार ही निभाऊंगा। वैसे भी 5-6 साल तक बॉलीवुड से दूर रहने के बाद मैंने महसूस किया कि मुझे तो बच्चा बच्चा भूल चुका है। तो मुझे लगा कि जब मैं छोटे छोटे महत्वपूर्ण किरदार कर लोगों को आकर्षित करूंगा। तो मेरे प्रशंसक मुझे वापस मिल जाएंगे। अब मेरे दर्शक बन चुके हैं। मुझे लगता है कि हर इंसान के अंदर एक पांच साल का छोटा बच्चा छिपा हुआ है, जो हंसना चाहता है।

 ‘आंखेंके प्रदर्शन के बाद आपके और गोविंदा के करियर में जबरदस्त बदलाव आया। उन्हें बीस फिल्में मिल गयीं। आपको काम नहीं मिला। पर आज 22 साल बाद आपके दर्शक हैं और गोविंदा के दर्शक नहीं हैं?

आपने बिल्कुल सही कहा। ‘आंखें’ के बाद गोविंदा सुपर स्टार बन गया। उसके बाद उसने 20-25 सुपरहिट फिल्में दी। गोविंदा ने ज्यादातर फिल्में डेविड धवन के साथ की कमाल की फिल्में थी। वह कमाल के अभिनेता हैं। मेरी नजर में गोविंदा हमेशा हीरो रहे और आज भी हैं। उनकी फिल्में चले या ना चलें, इससे फर्क नहीं पड़ता। मैं ही नहीं लोग भी उसे हमेशा हीरो नंबर वन के रूप में देखना चाहते हैं। पर मैंने अपने आपको चरित्र अभिनेता में ढाल लिया। गोविंदा आज भी हीरो हैं और मैं चरित्र अभिनेता।

अब तो गोविंदा की फिल्म देखने के लिए दर्शक नहीं मिल रहे हैं?

देखिए, मैं अपने आपको लक्की मानता हूं कि मैंने अपने अंदर बदलाव किया। मैंने पहले ही कहा कि हम कलाकार अपनी फिल्मों, अपने किरदारों की वजह से पहचाने जाते हैं। मैंने समय के साथ अपने अंदर बदलाव किया। गोंवंदा ने खुद को नहीं बदला। इसके बावजूद गोविंदा का नाम, गोविंदा की इज्जत हमेशा रहेगी। लोग गोविंदा की हीरो इमेज को नहीं भुला सकते। जहां तक फिल्मों की सफलता असफलता का सवाल है, तो हर फिल्म से कलाकार का करियर बदलता है। हो सकता है कि उसकी अगली फिल्म हिट हो जाए और वह फिर से सुपर हिट हो जाए। यहां तो हर शुक्रवार किस्मत बदलती है। मैं चरित्र कलाकार हूं, तो मेरी फिल्म हिट हो या फ्लॉप, कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने बंगलादेश से मुंबई वापस आने पर निर्णय लिया था कि मुझे हीरो वाली फिल्में मिलेंगी, तो भी मैं नहीं करूंगा। मैं तो बड़े बड़े किरदार ठुकरा देता हूं। मैं उन चार दृश्य वाले किरदार करना चाहता हूं, जो दर्शकों के दिलों दिमाग में छा जाएं। मुझे लगता है कि गोविंदा आज भी यदि गौरी शंकर जैसे किरदार निभाएं, तो वह स्टार बन सकते हैं। वह बड़े बड़े हीरो की छुट्टी कर सकता है। गोविंदा के सामने टिकना किसी हीरो के बस की बात नही हैं।

अब नया क्या कर रहे हैं?

मैंने रूचि नारायण की एनीमेशन फिल्म ‘हनुमान दा दमदार’ में एक किरदार नाजुक गाइड को आवाज दी है। यह फिल्म पहले डिंबंग थिएटर के अंदर बनी, फिर शूटिंग हुई।

फिल्म बेगम जानसे आपके करियर पर क्या असर पड़ा?

अब मुझे विलेन के किरदार मिलने लगे हैं। एक तेलगू फिल्म मिली है, जिसमें मै विलेन हूँ। दक्षिण भारत का एक सुपर स्टार इसमें हीरो हैं।