जब गुलज़ार साहब ने शब्दों को सही मायने दे दिया

गुलज़ार साहब के कलम में जादू है यह तो सब जानते हैं। वे जब कविता करने लगते हैं तो शब्द खुद उनके मुरीद बनते हुए दिखाई देते हैं लेकिन फिल्मों पर काम करना मतलब अपने आप में एक अलग प्रक्रिया से गुजरना होता है। इस संबंध में बातें होने लगी तो वे बोले, “किसी भी अच्छी फ़िल्म में सारी कलाएं मौजूद होती है। खासकर छह ललित कलाएं तो होती ही है। जिसमें आर्किटेक्चर, पेंटिंग, म्यूजिक, राइटिंग, फोटोग्राफी तथा पर्फॉर्मेंस होती है और यह सब एक ही रूप में साहित्य पर टिका होता है। फिल्म के पीछे एक कहानी, एक सिचुएशन होती है। इसीलिए फिल्म को भव्य माध्यम माना जाता है। फ़िल्म के लिये काम करते हुए आपको प्रत्येक कला में माहिर होना ही पड़ेगा वरना आप सारी कलाओं को एक रुप नहीं दे सकते और ना ही दर्शकों को बांधे रख सकते हो। जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उनकी बेटी मेघना की फिल्म मेकिंग के बारे में भी यही सोच है ? तो वे कहते हैं, “यह जरुरी नहीं कि वे मेरी तरह सोचें, वे अपने तरीके से काम करती है। फिलहाल वे दो पटकथाओं पर काम कर रही है। एक तो तैयार भी हो चुका है, कभी भी शुरू हो सकता है। मेरी यात्रा जड़ की तरफ है, मिट्टी की तरफ है और मेघना की यात्रा ऊपर की तरफ है यानी बढ़त की तरफ।” वाह, कितनी सुंदरता से गुलज़ार साहब ने शब्दों को सही मायने दे दिया।